अब हृदय पर कोई प्रतिबंध नहीं है By Smita Gupta
अब हृदय पर कोई प्रतिबंध नहीं है
चलो, आज प्रेम की कश्ती में सवार होकर
हम- तुम नौका विहार करें
जैसे नदी की देह पर डोलता है चांद
वैसे गंडक की जलधारा में डोले हमारी नाव
तुमने छेड़ दिया है
मेरे मन- मृग के नाभि कमल में बसी कस्तूरी की गंध को
जो मेरे हृदय कमल में
जो मेरे अंग- प्रत्यंग में
अब रच- बस गई है
और जिससे सुवासित हो उठा है यह मेरा जीवन
चलो, आज हम- तुम चंदन वन में चलें
चंदन की शीतलता और सुवास से
प्रेम की खुशबू और मिठास को तौलें
चलो, आज हम- तुम पंछी बन जाएं
और गुलमोहर की डाल पर एक घोंसला बनाएं
चलो, ऐसा करते हैं
तुम शिव बन जाओ
और मैं बन जाती हूं शिवप्रिया गंगा
तुम भी शिव की भांति शिरोधार्य कर लो मुझे
और मैं भी तुम्हारे सांवलें मुख को चूमते हुए
तुम्हारे अंगों से अठखेलियां करते हुए
कोई प्रेम- गीत गुनगुनाऊं
क्योंकि अब हृदय पर कोई प्रतिबंध नहीं है
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✍️ स्मिता गुप्ता

Smita Gupta
Assi. prof.(Hindi)
M. Ed. , Hindi Patrkarita
smita78gupta@gmail.com