प्रेम दिवस और गुलाब
जब बसंत फ़िजां में बिखेरता है उन्माद
तब हर मन, हर तन हो जाता है उन्मत्त
लाल पगड़ी पहनकर
गुलमोहर खिलखिलाता है
पीले फूलों का पीतांबर धारण कर
अमलतास चहकता है
किसी नवयौवना- सी बसंती रंग में रंग जाती है धरती
खेतों में खिलखिलाने लगते हैं
सरसों के पीले फूल
दमक उठते हैं
महक उठते हैं
आम और महुआ के मोजर
जो रिझाते हैं भवरों को
जो लुभाते हैं तितलियों को
जो मोह लेते हैं प्रेमियों का मधुकर- मन
ऐसे मौसम में
मैं बालपन से युवा बनने को आतुर
बसंत की मादकता को अपनी सांसों में भरने को व्याकुल
संगी- साथियों से होड़ लगाता
मैं यौवन की देहरी की ओर पग बढ़ा रहा था
मगर प्रेम दिवस को
किसी के प्रेम- प्रदर्शन के लिए
मुझे शाख़ से ज़ुदा कर दिया गया
प्रेम में उन्मत्त किसी ने स्टेट्स अपडेट किया
तो किसी ने फेसबुक पर फोटो लगाया
प्रेम दिवस पर उन वीरांगनाओं ने भी प्रेम गीत गाए
जिनके ‘प्रिय’ पुलवामा में
भारत माँ से प्रेम जताते हुए शहीद हुए
बाग़ की हर शाख़ पर खिले- अधखिले गुलाब
सब तोड़ लिए गए
प्रेयसियों को देने के लिए
टहनी से ज़ुदा कर दिए गए
वहीं, देश के वीर जवानों ने उस दिन
मातृभूमि को अर्पित किया गुलाब-सा अपना लाल रक्त
जननी जन्म भूमि को दिया यह अद्भुत उपहार
मैं पुलवामा के उन शहीदों के प्रति जताना चाहता था प्रेम
उनके गले लगना चाहता था
मगर बाग़ के किसी टहनी पर
शेष नहीं बचा था मेरा अस्तित्व