ताप
तुम तप्त हो
तुम्हारे तप्त होंठों को
तुम्हारी गर्म सांसों को
तुम्हारे तन- मन को चाहिए
चांदनी सी शीतलता
चांदनी की शीतलता
तुम पूछते हो हर घड़ी
मुझे क्या चाहिए ?
मैं भी तप्त हूं प्रिये
मुझे भी चाहिए शीतलता
तुम्हारी बांहों में आकर भी मैं नहीं तपी
ना मैंने तप्त होंठों के अंगारे पिए
ना नैनों के नेह भरे स्पर्श से
मेरे अंतस के घट शीतल नहीं हुए
वक्त की भट्टी में तपी हूं
हर दिन सुबह- सांझ जली हूं
और अब इस तपन को कम करने के लिए चाहिए मुझे
तुम्हारे मीठे शब्दों की
तुम्हारे प्यार से सने स्पर्श की
भावनाओं के कद्र की शीतलता
मुझे तन का ताप नहीं
मेरी आत्मा को चाहिए प्रीत की ठंडक
तुम नेह का मेघ बन बरसोगे
मेरे तप्त मन को शीतल करोगे
इसी आशा में तुम्हारी प्रतीक्षा में
मैं खड़ी हूं प्रियतम
तुम कब आओगे प्रिये ?
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✍️ स्मिता गुप्ता

Smita Gupta
Assi. prof.(Hindi)
M. Ed. , Hindi Patrkarita
smita78gupta@gmail.com