तुम्हारा आना वसंत

तुम्हारे दायरे बड़े हो गए हैं
मां- बाप, भाई – बहन, बच्चे, ऑफिस
ऑफिस के दोस्त, ऑफिस की ट्रिप
पर मैं तो वैसी की वैसी रही
आज भी वैसी हूं, जैसी कल थी
तुम्हारी बाट जोहती
तुम्हारी राह निहारती
तुम्हारे इंतजार में थमी सी
तुम्हारे अस्तित्व से बंधी सी
तुम्हारे जीवन तक सिमटी सी
यह घर
यह देहरी
यह दस बाई दस का कमरा
यह छह बाई छह का बिस्तर
और बिस्तर में तुम्हारा इंतजार
यही है मेरा घर-संसार
यही है मेरा जीवन-संसार
तुम्हारे प्यार के जादुई स्पर्श के लिए
तुमसे प्रेम- सुधा पाने के लिए
तरसता- तड़पता रहता है मेरा मन
जब तुम देहरी पर पांव धरते हो तो आता है सावन
जब तुम कोहबर में आते हो तो आता है फागुन
तुम्हारा बिछोह जेठ है
तुम्हारा आना वसंत

Smita Gupta

Assi. prof.(Hindi)
M. Ed. , Hindi Patrkarita
smita78gupta@gmail.com

✍️ स्मिता गुप्ता