तुम्हारा शहर

कितना अजीब है तुम्हारा शहर
और कितने अजीब हैं
ये तुम्हारे शहर के बाशिंदे
पता नहीं कितनी बार तुम्हारे घर तक
आने- जाने वाले पथ पर मैंने अपने पांव धरे
पता नहीं कितनी बार मेरी आवारा नज़रें
तुम्हारे शहर की कितनी औरतों की मुख चूमीं
पता नहीं कितनी बार मेरी देह की कस्तूरी गंध
ना जाने कितनी औरतों की गर्म सांसों में घुली
फिर भी किसी की आंखों में ना चांद उतरा
ना किसी के होंठों पर गुलमोहर का फूल खिला
कंक्रीट के बिल्डिंग- सा संवेदन शून्य दिखा
यह तुम्हारा शहर
सचमुच कितना अजीब है यह तुम्हारा शहर
ऐसे शहर में तुम कैसे रहते हो कवि
ऐसे शहर में तुम कैसे जिंदा हो कवि ?
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कुमार बिंदु